जमानत कैसे मिलती है: गिरफ्तारी के बाद जमानत की प्रक्रिया, न्यायालय, समय-सीमा, जमानतदार और आम अपराधों में जमानत (BNSS 2023)

जमानत (bail) का अर्थ है कि किसी अपराध का अभियुक्त कुछ शर्तों पर, बंधपत्र (bond) या जमानतपत्र (bail bond) देकर, पुलिस या जेल की अभिरक्षा से छोड़ दिया जाए; मुकदमा चलता रहता है। जमानत कैसे मिलेगी, यह इस पर निर्भर करता है कि अपराध जमानतीय (bailable) है या अजमानतीय (non-bailable)। जमानतीय अपराध में जमानत अधिकार है: व्यक्ति जमानत देने को तैयार हो तो वह “जमानत पर छोड़ दिया जाएगा” (धारा 478, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS); पहले CrPC की धारा 436)। अजमानतीय अपराध में जमानत विवेक पर है: पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट धारा 480 BNSS (पहले CrPC की धारा 437) के अधीन, और सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय धारा 483 BNSS (पहले CrPC की धारा 439) के अधीन जमानत दे सकते हैं। गिरफ्तारी से पहले अग्रिम जमानत (anticipatory bail) धारा 482 BNSS (पहले CrPC की धारा 438) में है।

जमानत के आदेश के बाद अभियुक्त बंधपत्र भरता है और, जहां न्यायालय कहे, प्रतिभू (surety, बोलचाल में जमानतदार) देता है (धारा 485); इसके बाद न्यायालय जेल को रिहाई का आदेश भेजता है (धारा 487)। जमानत अर्जी के फैसले के लिए कानून में कोई तय दिन नहीं हैं, पर कुछ समय-सीमाएं तय हैं, जैसे जांच 60 या 90 दिन में पूरी न होने पर जमानत (धारा 187(3))। 1 जुलाई 2024 को लंबित मामलों में पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) लागू रहती है (धारा 531 BNSS)।

जमानत: एक नज़र में

  • जमानत क्या है: शर्तों पर, बंधपत्र या जमानतपत्र देकर, विधि की अभिरक्षा से छोड़ा जाना (धारा 2(1)(ख) BNSS)।
  • जमानतीय या अजमानतीय: BNSS की प्रथम अनुसूची में हर अपराध के आगे लिखा है (धारा 2(1)(ग))।
  • जमानतीय अपराध: जमानत अधिकार है; जो निर्धन व्यक्ति प्रतिभू न दे सके, वह बंधपत्र पर छोड़ा जाएगा (धारा 478)।
  • अजमानतीय अपराध: पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट (धारा 480) या सेशन न्यायालय/उच्च न्यायालय (धारा 483) के विवेक पर।
  • हत्या (धारा 103 BNS, पहले 302 IPC): अजमानतीय, सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय; दोषी होने का विश्वास करने के उचित आधार हों तो मजिस्ट्रेट पर धारा 480(1)(i) की रोक (शिशु, महिला, रोगी या शिथिलांग को छोड़कर), इसलिए अर्जी सामान्यतः सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय में।
  • कितने दिन: BNSS में तय नहीं; सुप्रीम कोर्ट (2022): जमानत अर्जी सामान्यतः दो सप्ताह में निपटे; जांच पूरी न होने पर 60 या 90 दिन बाद जमानत (धारा 187(3))।
  • जमानतदार: एक या अधिक पर्याप्त प्रतिभू; हर प्रतिभू घोषणा करता है कि वह कितने लोगों का प्रतिभू है (धारा 485, 486)।
  • जमानत रद्द: न्यायालय फिर से गिरफ्तारी का निदेश दे सकता है (धारा 480(5), 483(3))।

Reviewed and updated by Century Law Firm, Delhi – October 2026. Statutory references are to the Acts as in force on that date. The Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 and the Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 are quoted from their English texts on India Code (as on 6 October 2025; no later amendment of the sections used was found) and their Hindi wording from the official Hindi texts in the Gazette of India; the Negotiable Instruments Act, 1881 and the Legal Services Authorities Act, 1987 from India Code; the Ministry of Home Affairs’ SOP of 2 December 2025 and the DSLSA Legal Aid page from the official websites; and the judgments and orders from the Supreme Court’s own copies.

अक्टूबर 2026 में अद्यतन। उद्धरण-चिह्नों में दिए धाराओं के हिंदी अंश भारत के राजपत्र में प्रकाशित आधिकारिक हिंदी पाठ से हैं; निर्णयों और सरकारी दस्तावेज़ों के उद्धरण अंग्रेज़ी मूल में हैं; बाकी पाठ फर्म का सरल सारांश है।

फर्म के अधिवक्ता इस वीडियो में गिरफ्तारी के बाद जमानत के बारे में बताते हैं। वीडियो में पुरानी CrPC की धाराएं 437 और 439 बताई गई हैं; अब ये BNSS की धारा 480 और 483 हैं।

जमानत क्या है? (What is bail)

BNSS की धारा 2(1)(ख) के अनुसार ““जमानत” से किसी अधिकारी या न्यायालय द्वारा अधिरोपित कतिपय शर्तों पर किसी अपराध के कारित किए जाने के अभियुक्त या संदिग्ध व्यक्ति द्वारा किसी बंधपत्र या जमानतपत्र के निष्पादन पर विधि की अभिरक्षा से ऐसे व्यक्ति का छोड़ा जाना अभिप्रेत है”। “जमानतपत्र” प्रतिभूति के साथ छोड़े जाने का वचनबंध है, और “बंधपत्र” प्रतिभूति के बिना (धारा 2(1)(घ), (ङ))। यानी बंधपत्र में केवल अभियुक्त वचन देता है; जमानतपत्र में उसके साथ प्रतिभू भी जिम्मेदारी लेता है। जमानत से मुकदमा खत्म नहीं होता: व्यक्ति को बंधपत्र में लिखे समय और स्थान पर तब तक हाजिर होते रहना होता है जब तक पुलिस अधिकारी या न्यायालय अन्यथा न कहे (धारा 485(1))।

जमानत के नियम BNSS के अध्याय 35, “जमानत और बंधपत्रों के बारे में उपबंध”, में हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS), जिसने IPC की जगह ली है, अपराध और सजा बताती है; उसमें जमानत देने की धारा नहीं है। इस लेख में मुख्य धाराओं के साथ कोष्ठक में पुरानी CrPC या IPC की धारा दी गई है।

जमानतीय और अजमानतीय अपराध: कैसे पता करें

धारा 2(1)(ग) के अनुसार ““जमानतीय अपराध” से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो प्रथम अनुसूची में जमानतीय के रूप में दिखाया गया है या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा जमानतीय बनाया गया है और “अजमानतीय अपराध” से कोई अन्य अपराध अभिप्रेत है”। BNSS की प्रथम अनुसूची (First Schedule) में हर अपराध के आगे “जमानतीय या अजमानतीय” खाना है। एफआईआर की हर धारा अलग से देखनी होती है; धारा 478 का अधिकार केवल उसे है जो अजमानतीय अपराध का अभियुक्त नहीं है, इसलिए एक भी धारा अजमानतीय हो तो जमानत धारा 480 या 483 के अधीन मांगनी होती है।

“संज्ञेय” (cognizable) का अर्थ केवल इतना है कि पुलिस वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकती है (धारा 2(1)(छ)); संज्ञेय अपराध भी जमानतीय हो सकता है, जैसे उपेक्षा द्वारा मृत्यु कारित करना (धारा 106(1) BNS)। दूसरे कानूनों के अपराधों के लिए, जब तक वह कानून कुछ और न कहे, प्रथम अनुसूची का भाग II यह नियम देता है:

दूसरे कानून में सजासंज्ञेय या असंज्ञेयजमानतीय या अजमानतीयकिस न्यायालय द्वारा विचारणीय
मृत्यु, आजीवन कारावास या 7 वर्ष से अधिक का कारावाससंज्ञेयअजमानतीयसेशन न्यायालय
3 वर्ष और उससे अधिक, किंतु 7 वर्ष से अनधिकसंज्ञेयअजमानतीयप्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट
3 वर्ष से कम का कारावास या केवल जुर्मानाअसंज्ञेयजमानतीयकोई मजिस्ट्रेट

1 जुलाई 2024 से पहले किए गए अपराधों में सजा पुरानी IPC के अनुसार होती है (धारा 358 BNS), इसलिए एफआईआर में पुरानी धाराएं भी हो सकती हैं। उनका नया नंबर फर्म के IPC से BNS और CrPC से BNSS तुलना टूल में देखा जा सकता है।

गिरफ्तारी के बाद जमानत कैसे मिलती है: चरण-दर-चरण

नीचे के चरण BNSS की धाराओं पर आधारित हैं; अर्जी का प्रारूप और कागज़ हर न्यायालय में अलग हो सकते हैं।

चरण 1: गिरफ्तारी के समय के अधिकार

पुलिस गिरफ्तार व्यक्ति को अपराध की पूरी जानकारी या गिरफ्तारी के आधार बताएगी (धारा 47(1))। अपराध जमानतीय हो तो पुलिस अधिकारी “गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को सूचना देगा कि वह जमानत पर छोड़े जाने का हकदार है और वह अपनी ओर से प्रतिभुओं का इंतजाम करे” (धारा 47(2))। गिरफ्तारी और रखे जाने के स्थान की जानकारी उसके किसी नातेदार, मित्र या बताए गए व्यक्ति को तुरंत दी जाएगी (धारा 48(1))। वारंट के बिना गिरफ्तार व्यक्ति को, यात्रा का समय छोड़कर, चौबीस घंटे से अधिक पुलिस अभिरक्षा में नहीं रखा जा सकता, जब तक मजिस्ट्रेट धारा 187 के अधीन विशेष आदेश न दे (धारा 58; संविधान का अनुच्छेद 22(2))।

चरण 2: जमानतीय अपराध में जमानत

धारा 478(1) के अनुसार जब अजमानतीय अपराध के अभियुक्त से भिन्न कोई व्यक्ति थाने में या न्यायालय के सामने जमानत देने के लिए तैयार है, “तब ऐसा व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाएगा”। व्यक्ति निर्धन हो और प्रतिभू न दे सके, तो उसे केवल बंधपत्र पर छोड़ा जाएगा; गिरफ्तारी के एक सप्ताह के भीतर जमानतपत्र न दे पाना उसे निर्धन मानने का पर्याप्त आधार है (परंतुक और स्पष्टीकरण)। जो व्यक्ति बंधपत्र के अनुसार हाजिर नहीं हुआ, उसे न्यायालय उसी मामले में अगली बार जमानत देने से मना कर सकता है (धारा 478(2))।

चरण 3: अजमानतीय अपराध में जमानत अर्जी

पहला रास्ता धारा 480(1) है: पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी, या उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय से भिन्न न्यायालय (व्यवहार में मजिस्ट्रेट), व्यक्ति को जमानत पर छोड़ सकता है। यह विवेक है, और खंड (i) की रोक है: “यदि यह विश्वास करने के लिए उचित आधार प्रतीत होते हैं कि ऐसा व्यक्ति मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध का दोषी है तो वह इस प्रकार नहीं छोड़ा जाएगा”। खंड (ii) कुछ पहले से दोषसिद्ध व्यक्तियों पर रोक लगाता है। पर पहला परंतुक कहता है: “न्यायालय यह निदेश दे सकेगा कि खंड (i) या खंड (ii) में निर्दिष्ट व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाए यदि ऐसा व्यक्ति, शिशु है या कोई महिला या कोई रोगी या शिथिलांग व्यक्ति है”। यह छूट केवल न्यायालय दे सकता है, पुलिस नहीं; “शिशु” यानी अठारह वर्ष से कम आयु का व्यक्ति (धारा 2(3) BNS)।

दूसरा रास्ता धारा 483(1) है: सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय “किसी ऐसे व्यक्ति को, जिस पर किसी अपराध का अभियोग है और जो अभिरक्षा में है” जमानत पर छोड़ सकता है। इसमें धारा 480(1)(i) वाली रोक नहीं है, और ये न्यायालय मजिस्ट्रेट की लगाई शर्तें हटा या बदल सकते हैं (धारा 483(1)(ख))।

चरण 4: सुनवाई, आदेश और शर्तें

लोक अभियोजक (Public Prosecutor) राज्य की ओर से पक्ष रखता है। मृत्यु, आजीवन कारावास या सात वर्ष या अधिक की सजा वाले अपराध में न्यायालय धारा 480(1) के अधीन लोक अभियोजक को सुनवाई का अवसर दिए बिना जमानत नहीं देगा (चौथा परंतुक)। सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय उस अपराध में, जो अनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है या आजीवन कारावास से दंडनीय है, जमानत से पहले लोक अभियोजक को आवेदन की सूचना देगा, जब तक लिखित कारणों से यह साध्य न हो (धारा 483(1), पहला परंतुक)। BNS की धारा 65 या 70(2) के मामलों में सूचना देने वाले या उसके द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति की उपस्थिति सुनवाई में बाध्यकारी है (धारा 483(2))।

सात वर्ष या उससे अधिक तक की सजा वाले अपराध, या BNS के अध्याय 6, 7 या 17 (मानव शरीर, राज्य और संपत्ति के विरुद्ध अपराध) के अपराध में, धारा 480(1) के अधीन जमानत देते समय न्यायालय तीन शर्तें अवश्य लगाएगा: व्यक्ति बंधपत्र के अनुसार हाजिर होगा; वैसा ही अपराध नहीं करेगा; और गवाहों को धमकी या लालच नहीं देगा या साक्ष्य नहीं बिगाड़ेगा (धारा 480(3))। सेशन न्यायालय और उच्च न्यायालय भी ऐसी शर्तें लगा सकते हैं (धारा 483(1)(क))। ये शर्तें बंधपत्र में लिखी जाती हैं (धारा 485(2))।

चरण 5: बंधपत्र, प्रतिभू और रिहाई का आदेश

बंधपत्र की रकम परिस्थितियों को देखकर तय होगी “और अत्यधिक नहीं होगी” (धारा 484(1))। जमानतपत्र पर छोड़े जाने पर “एक या अधिक पर्याप्त प्रतिभुओं” का बंधपत्र भी लिया जाता है (धारा 485(1)); हर प्रतिभू घोषणा करता है कि वह कितने लोगों का प्रतिभू है (धारा 486)। बंधपत्र के बदले नकद राशि या सरकारी वचन पत्र जमा करने की अनुमति भी दी जा सकती है (धारा 490, “मुचलके के बजाय निक्षेप”)। इसके बाद धारा 487(1) के अनुसार “ज्यों ही बंधपत्र या जमानतपत्र निष्पादित कर दिया जाता है, त्यों ही वह व्यक्ति … छोड़ दिया जाएगा, और जब वह कारागार में हो तब उसकी जमानत मंजूर करने वाला न्यायालय जेल के भारसाधक अधिकारी को उसके छोड़े जाने के लिए आदेश जारी करेगा”।

जमानत का रास्ता: गिरफ्तारी से रिहाई तक भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धाराएं (कोष्ठक में पुरानी CrPC धारा)
1गिरफ्तारीआधार बताए जाएंगे; परिवार को सूचना; 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने।धारा 47, 48, 58
2अपराध कैसा है?प्रथम अनुसूची देखें: जमानतीय या अजमानतीय।धारा 2(1)(ग)
3जमानतीय हो तोजमानत अधिकार है; थाने या न्यायालय से।धारा 478 (436)
4अजमानतीय हो तोअर्जी मजिस्ट्रेट के सामने, या सेशन न्यायालय/उच्च न्यायालय में।धारा 480 (437), 483 (439)
5सुनवाई और आदेशगंभीर अपराधों में लोक अभियोजक की सुनवाई; शर्तों के साथ आदेश।धारा 480(1), 480(3), 483(1)
6बंधपत्र और प्रतिभूरकम अत्यधिक नहीं; प्रतिभू की घोषणा।धारा 484, 485, 486
↓
रिहाईबंधपत्र भरते ही न्यायालय जेल को रिहाई आदेश भेजता है।धारा 487 (442)
ध्यान रखेंतारीखों पर हाजिर रहें; शर्त तोड़ने पर जमानत रद्द हो सकती है।धारा 480(5), 483(3), 492

Century Law Firm द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धाराओं 2, 47, 48, 58, 478, 480 और 483 से 492 तथा प्रथम अनुसूची (अंग्रेज़ी पाठ India Code, 6 अक्टूबर 2025 तक; आधिकारिक हिंदी पाठ, भारत का राजपत्र) से तैयार।

जेल से जमानत कैसे मिलती है?

जेल में बंद व्यक्ति के लिए अर्जी मजिस्ट्रेट के सामने धारा 480 BNSS के अधीन, या सेशन न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय में धारा 483 के अधीन दी जाती है; अधिवक्ता न हो तो मुफ्त कानूनी सहायता ली जा सकती है (नीचे देखें)। जमानत और बंधपत्र के बाद जेल का भारसाधक अधिकारी न्यायालय के रिहाई आदेश की “प्राप्ति पर उसे छोड़ देगा” (धारा 487(1))। जो विचाराधीन कैदी अधिकतम सजा की आधी अवधि (पहली बार के अपराधी के लिए एक-तिहाई) जेल में बिता चुका है, उसकी रिहाई के लिए जेल अधीक्षक स्वयं न्यायालय में आवेदन करेगा (धारा 479(3), पहले CrPC की धारा 436A); यह नियम मृत्यु या आजीवन कारावास वाले अपराधों पर, और जहां “एक से अधिक अपराध या बहु मामले” लंबित हों वहां, लागू नहीं होता (धारा 479(1), (2))। सुप्रीम कोर्ट के 23 अगस्त 2024 के आदेश (In Re: Inhuman Conditions in 1382 Prisons) में केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल का यह कथन दर्ज है कि यह धारा उन विचाराधीन कैदियों पर भी लागू होगी जिनके मामले 1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज हुए थे, और न्यायालय ने जेल अधीक्षकों के माध्यम से धारा 479 को तुरंत लागू करने का निदेश दिया।

कौन सा न्यायालय जमानत देता है: मजिस्ट्रेट, सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय

बिंदुधारा 480 BNSS (पहले 437 CrPC)धारा 483 BNSS (पहले 439 CrPC)
कौन जमानत देता हैथाने का भारसाधक अधिकारी (वारंट के बिना गिरफ्तारी में) या उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय से भिन्न न्यायालय, व्यवहार में मजिस्ट्रेटसेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय
रोकमृत्यु या आजीवन कारावास वाले अपराध के दोषी होने का विश्वास करने के उचित आधार हों तो नहीं; न्यायालय शिशु, महिला, रोगी या शिथिलांग व्यक्ति को फिर भी छोड़ सकता हैऐसी रोक नहीं
लोक अभियोजकमृत्यु, आजीवन कारावास या 7 वर्ष या अधिक वाले अपराध में सुनवाई का अवसरअनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय या आजीवन कारावास वाले अपराध में आवेदन की सूचना
शर्तें और रकम7 वर्ष या अधिक, या BNS अध्याय 6, 7, 17 के अपराधों में तीन शर्तें अनिवार्यशर्तें लगा सकता है; मजिस्ट्रेट की शर्तें बदल सकता है; जमानत की रकम घटा सकता है (धारा 484(2))
फिर से गिरफ्तारीजमानत देने वाला न्यायालय (धारा 480(5))इस अध्याय के अधीन छूटा कोई भी व्यक्ति (धारा 483(3))

दिल्ली में किसी थाने का मामला किस ज़िला न्यायालय में जाता है, यह फर्म के Find Your Court and District टूल से देखा जा सकता है। उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) से जमानत भी धारा 483 के अधीन ही मांगी जाती है।

गिरफ्तारी से पहले: अग्रिम जमानत (धारा 482 BNSS)

धारा 482(1) के अनुसार “जब किसी व्यक्ति को यह विश्वास करने का कारण है कि हो सकता है उसको किसी अजमानतीय अपराध के किए जाने के अभियोग में गिरफ्तार किया जा सकता है, तो वह इस धारा के अधीन निदेश के लिए उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय को आवेदन कर सकेगा”। आदेश के बाद उसी अभियोग में गिरफ्तारी हो तो जमानत देने को तैयार व्यक्ति को छोड़ दिया जाएगा, और यदि संज्ञान लेने वाला मजिस्ट्रेट पहली बार में ही वारंट जारी करना तय करे, तो वह जमानतीय वारंट जारी करेगा (धारा 482(3))। गिरफ्तारी के बाद अग्रिम जमानत की अर्जी नहीं चलती; सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के निर्णय सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) (29 जनवरी 2020) में न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट ने गुरबख्श सिंह सिब्बिया (1980) के निर्णय का यही सार दर्ज किया है। उसी निर्णय के अनुसार अग्रिम जमानत सामान्यतः किसी निश्चित अवधि तक सीमित नहीं होती और “can continue till the end of the trial”, जब तक न्यायालय विशेष कारणों से उसे सीमित न करे।

यह धारा BNS की धारा 65 (सोलह या बारह वर्ष से कम आयु की लड़की से बलात्संग; पहले IPC 376(3), 376AB) और धारा 70(2) (अठारह वर्ष से कम आयु की लड़की से सामूहिक बलात्संग) के अभियोग पर लागू नहीं होती (धारा 482(4)); बलात्संग की सामान्य धारा 64 BNS (पहले 376(1), (2) IPC) पर यह रोक नहीं है। पहले सेशन न्यायालय जाना चाहिए या सीधे उच्च न्यायालय, इस पर सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने 8 सितंबर 2025 के आदेश में कहा था कि सेशन न्यायालय को छोड़कर सीधे उच्च न्यायालय जाने को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए और उच्च न्यायालय केवल “special/extra-ordinary circumstances” में, कारण दर्ज करके, सीधे अर्जी सुने; 12 नवंबर 2025 को मामला तीन न्यायाधीशों की पीठ के सामने सुनवाई के लिए भेजा गया, और अंतिम निर्णय वही पीठ देगी। विस्तार: फर्म की मार्गदर्शिका Anticipatory Bail: Section 482 BNSS।

जमानत कितने दिन में होती है?

BNSS में साधारण जमानत अर्जी के फैसले के लिए कोई तय दिन नहीं हैं; सुनवाई और आदेश न्यायालय, तथ्यों और लोक अभियोजक के जवाब पर निर्भर हैं। सुप्रीम कोर्ट ने Satender Kumar Antil v. CBI (11 जुलाई 2022) में निर्देश दिया: “Bail applications ought to be disposed of within a period of two weeks except if the provisions mandate otherwise”, यानी जमानत अर्जियां दो सप्ताह में निपटाई जानी चाहिए, जब तक कानून कुछ और न कहे या कोई बीच का आवेदन न हो; अग्रिम जमानत के लिए छह सप्ताह। कानून में तय समय-सीमाएं ये हैं:

स्थितिसमय-सीमाधारा
वारंट के बिना गिरफ्तारी के बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेशी24 घंटे, यात्रा का समय छोड़करधारा 58; अनुच्छेद 22(2)
जांच पूरी न होने पर जमानत: मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष या अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध90 दिन की अभिरक्षा के बादधारा 187(3)(i) (पहले 167(2) CrPC)
जांच पूरी न होने पर जमानत: अन्य अपराध60 दिन के बादधारा 187(3)(ii)
मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय अजमानतीय मामला, अभियुक्त पूरे समय अभिरक्षा मेंसाक्ष्य की पहली तारीख से 60 दिन में विचारण पूरा न हो तो जमानत, जब तक मजिस्ट्रेट लिखित कारणों से अन्यथा न कहेधारा 480(6)
विचाराधीन कैदी (मृत्यु या आजीवन कारावास वाले अपराध छोड़कर)अधिकतम सजा की आधी अवधि; पहली बार के अपराधी के लिए एक-तिहाईधारा 479
जमानतीय अपराध में निर्धन व्यक्तिएक सप्ताह में जमानतपत्र न दे पाए तो निर्धन माना जा सकता हैधारा 478, स्पष्टीकरण

धारा 187(3) में अवधि समाप्त होने पर “यदि अभियुक्त व्यक्ति जमानत देने के लिए तैयार है और दे देता है तो उसे जमानत पर छोड़ दिया जाएगा”। Enforcement Directorate v. Kapil Wadhawan (27 मार्च 2023, पुरानी धारा 167 CrPC के अधीन) के अनुसार गिनती उस तारीख से होती है जिस दिन मजिस्ट्रेट रिमांड देता है, और M. Ravindran v. Intelligence Officer, DRI (26 अक्टूबर 2020, पुरानी धारा 167 CrPC के अधीन) के अनुसार आवेदन आरोप-पत्र दाखिल होने से पहले करना होता है। दिन गिनने में फर्म का Limitation Calculator (दो तारीखों के बीच के दिन) मदद कर सकता है; पर लिमिटेशन की सामान्य गिनती के विपरीत यहां रिमांड का दिन भी गिना जाता है, इसलिए रिमांड का दिन पहला दिन गिनें।

आम अपराधों में जमानत: धारा 302, 307, 304, 304A, 306, 379, 411, 353, 354, 498A, 304B, 120B और चेक बाउंस

यह तालिका BNSS की प्रथम अनुसूची (भाग I और II) और फर्म के राजपत्र से मिलान किए गए धारा-तुलना आंकड़ों से बनी है। हर धारा का पूरा कानून उसके फर्म के लेख में है (लिंक); यहां केवल जमानत का प्रश्न है।

अपराधनई धारा (BNS)पुरानी धारा (IPC)संज्ञेय?जमानतीय?विचारण
हत्या103(1)302संज्ञेयअजमानतीयसेशन न्यायालय
हत्या, सामान्य आशय से103(1) के साथ 3(5)302 के साथ 34संज्ञेयअजमानतीयसेशन न्यायालय
हत्या का प्रयत्न109(1)307संज्ञेयअजमानतीयसेशन न्यायालय
हत्या की कोटि में न आने वाला आपराधिक मानव वध105304संज्ञेयअजमानतीयसेशन न्यायालय
उपेक्षा द्वारा मृत्यु कारित करना106(1)304Aसंज्ञेयजमानतीयप्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट
आत्महत्या का दुष्प्रेरण108306संज्ञेयअजमानतीयसेशन न्यायालय
चोरी303(2)379संज्ञेयअजमानतीयकोई मजिस्ट्रेट
चुराई हुई संपत्ति बेईमानी से प्राप्त करना317(2)411संज्ञेयअजमानतीयकोई मजिस्ट्रेट
लोक सेवक को कर्तव्य से भयोपरत करने के लिए हमला132353संज्ञेयअजमानतीयकोई मजिस्ट्रेट
महिला की लज्जा भंग करने के आशय से हमला74354संज्ञेयअजमानतीयकोई मजिस्ट्रेट
लैंगिक उत्पीड़न75(2), 75(3)354Aसंज्ञेयअजमानतीयसेशन न्यायालय
विवस्त्र करने के आशय से महिला पर हमला76354Bसंज्ञेयअजमानतीयसेशन न्यायालय
विवाहित महिला के प्रति क्रूरता85498Aकेवल तब, जब सूचना पीड़ित महिला, उसका नातेदार या (नातेदार न हो तो) अधिसूचित लोक सेवक देअजमानतीयप्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट
दहेज मृत्यु80(2)304Bसंज्ञेयअजमानतीयसेशन न्यायालय
आपराधिक षड्यंत्र61(2)120Bगंभीर अपराध के षड्यंत्र में: उद्दिष्ट अपराध के अनुसार; कोई अन्य षड्यंत्र: असंज्ञेय, जमानतीय, प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट
चेक बाउंसधारा 138, परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881असंज्ञेयजमानतीयमहानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट

ध्यान दें: यह वर्गीकरण BNSS की प्रथम अनुसूची का है। जो अपील, आवेदन, विचारण, जांच या अन्वेषण 1 जुलाई 2024 से ठीक पहले लंबित था, वह पुरानी CrPC के अनुसार चलता है (धारा 531(2) BNSS)। CrPC की प्रथम अनुसूची में धारा 354A IPC (लैंगिक उत्पीड़न) जमानतीय और कोई मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय थी, और धारा 354B IPC अजमानतीय पर कोई मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय थी।

कौन सी धारा, कौन सा न्यायालय BNSS की प्रथम अनुसूची के अनुसार (कोष्ठक में पुरानी IPC धारा)
जमानतीय: जमानत अधिकार है
  • 106(1) उपेक्षा से मृत्यु (304A)
  • चेक बाउंस, धारा 138 NI Act
धारा 478 BNSS
अजमानतीय, मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय
  • 303(2) चोरी (379)
  • 317(2) चोरी का माल (411)
  • 132 लोक सेवक पर हमला (353)
  • 74 लज्जा भंग (354)
  • 85 क्रूरता (498A)
धारा 480 या 483
अजमानतीय, सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय
  • 103(1) हत्या (302)
  • 109(1) हत्या का प्रयत्न (307)
  • 105 आपराधिक मानव वध (304)
  • 108 आत्महत्या का दुष्प्रेरण (306)
  • 80(2) दहेज मृत्यु (304B)
  • 75, 76 (354A, 354B)
धारा 480 या 483

Century Law Firm द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की प्रथम अनुसूची (भाग I और II; अंग्रेज़ी पाठ India Code, 6 अक्टूबर 2025 तक, और आधिकारिक हिंदी पाठ) और परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138, 142 और 143 से तैयार। मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध के दोषी होने का विश्वास करने के उचित आधार हों, तो पुलिस या मजिस्ट्रेट जमानत नहीं दे सकते (धारा 480(1)(i)); न्यायालय फिर भी शिशु, महिला, रोगी या शिथिलांग व्यक्ति को छोड़ सकता है। 1 जुलाई 2024 से पहले से लंबित मामलों में पुरानी CrPC की अनुसूची लागू होती है (धारा 531 BNSS)।

धारा 302 (अब धारा 103 BNS) में जमानत कैसे मिलती है?

हत्या की सजा मृत्यु या आजीवन कारावास और जुर्माना है; प्रथम अनुसूची में यह “संज्ञेय”, “अजमानतीय” और “सेशन न्यायालय” द्वारा विचारणीय है। पुलिस अधिकारी और मजिस्ट्रेट पर धारा 480(1)(i) की रोक लागू होती है (केवल न्यायालय शिशु, महिला, रोगी या शिथिलांग व्यक्ति को छोड़ सकता है), इसलिए हत्या में जमानत अर्जी सामान्यतः सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय में धारा 483 के अधीन दी जाती है। हत्या अनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है, इसलिए जमानत से पहले लोक अभियोजक को सूचना दी जाएगी (धारा 483(1), पहला परंतुक)। जमानत मिलेगी या नहीं, यह न्यायालय हर मामले के तथ्यों पर तय करता है। जांच 90 दिन में पूरी न हो तो धारा 187(3)(i) लागू होती है; धारा 479 (आधी अवधि का नियम) और धारा 480(6) हत्या पर लागू नहीं होतीं।

302 के साथ 34: धारा 34 IPC अब BNS की धारा 3(5) है, जो अलग अपराध नहीं बनाती: “जब कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा अपने सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया जाता है, तब ऐसे व्यक्तियों में से प्रत्येक व्यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्व के अधीन है, मानो वह कार्य अकेले उसी ने किया हो”। इसलिए 302/34 में जमानत का नियम हत्या वाला ही है; हर अभियुक्त की भूमिका न्यायालय अलग से देखता है (फर्म का लेख: Section 34 IPC)।

धारा 307, 304, 306 और 304A (अब 109, 105, 108 और 106(1) BNS)

हत्या का प्रयत्न, आपराधिक मानव वध और आत्महत्या का दुष्प्रेरण अजमानतीय और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय हैं। धारा 105 के पहले भाग में (जब कार्य मृत्यु आदि कारित करने के आशय से किया गया हो), और धारा 109(1) में जब किसी को उपहति (चोट) कारित हो, आजीवन कारावास तक की सजा है, इसलिए वहां मजिस्ट्रेट पर धारा 480(1)(i) की रोक लागू हो सकती है; धारा 105 के दूसरे भाग (आशय के बिना, केवल यह ज्ञान कि मृत्यु सम्भाव्य है) में सजा दस वर्ष तक है। धारा 108 में सजा दस वर्ष तक का कारावास और जुर्माना है; उस पर यह रोक नहीं, पर लोक अभियोजक को सुनवाई का अवसर देना होगा। उपेक्षा द्वारा मृत्यु कारित करना (106(1)) संज्ञेय होते हुए भी जमानतीय है, इसलिए उसमें जमानत धारा 478 के अधीन अधिकार है।

चोरी (धारा 379, अब 303(2)) और चोरी का माल (धारा 411, अब 317(2))

दोनों संज्ञेय, अजमानतीय और कोई मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय हैं। चोरी की सजा तीन वर्ष तक, या जुर्माना, या दोनों है (दूसरी या बाद की दोषसिद्धि पर एक से पांच वर्ष का कठोर कारावास और जुर्माना), और चुराई हुई संपत्ति प्राप्त करने की तीन वर्ष तक। इसलिए धारा 480(1)(i) की रोक नहीं है और मजिस्ट्रेट धारा 480 के अधीन जमानत दे सकता है; ये BNS के अध्याय 17 के अपराध हैं, इसलिए धारा 480(3) की तीनों शर्तें लगेंगी। अभियुक्त पूरे समय अभिरक्षा में हो और साक्ष्य की पहली तारीख से 60 दिन में विचारण पूरा न हो, तो धारा 480(6) लागू होती है। 5,000 रुपए से कम मूल्य की चोरी में, पहली बार दोषसिद्धि पर, संपत्ति या उसका मूल्य लौटाने पर सजा सामुदायिक सेवा है (धारा 303(2) का परंतुक); प्रथम अनुसूची में यह पंक्ति असंज्ञेय और जमानतीय है।

धारा 353 (अब 132), और धारा 354, 354A, 354B (अब 74, 75, 76 BNS)

लोक सेवक को कर्तव्य से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल (132) की सजा दो वर्ष तक, या जुर्माना, या दोनों है, फिर भी प्रथम अनुसूची इसे संज्ञेय और अजमानतीय बताती है; कोई मजिस्ट्रेट इसका विचारण करता है और यह BNS के अध्याय 6 में है, इसलिए धारा 480(3) की शर्तें लगेंगी। लज्जा भंग करने के आशय से हमला (74; एक से पांच वर्ष और जुर्माना) अजमानतीय और कोई मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। लैंगिक उत्पीड़न (75) और विवस्त्र करने के आशय से हमला (76; तीन से सात वर्ष और जुर्माना) प्रथम अनुसूची में अजमानतीय और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय हैं; धारा 76 में लोक अभियोजक की सुनवाई और धारा 480(3) की शर्तें लागू होंगी। सभी में जमानत धारा 480 या 483 के अधीन मांगी जाती है।

दहेज केस, 498A (अब 85 BNS) और दहेज मृत्यु (अब 80 BNS)

क्रूरता (85) अजमानतीय और प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है; यह संज्ञेय तभी है जब सूचना पीड़ित महिला, उसका रक्त, विवाह या दत्तक ग्रहण से नातेदार, या ऐसा नातेदार न हो तो अधिसूचित लोक सेवक दे। गिरफ्तारी की आशंका हो तो अग्रिम जमानत (धारा 482), और गिरफ्तारी के बाद धारा 480 या 483 के अधीन जमानत मांगी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने Social Action Forum for Manav Adhikar v. Union of India (14 सितंबर 2018) में कहा कि “recovery of disputed dowry items may not by itself be a ground while rejecting an application for grant of bail under Section 498-A IPC”। दहेज मृत्यु (80(2); कम से कम सात वर्ष से आजीवन कारावास तक) अजमानतीय और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है। विस्तार: Bail in dowry case in Delhi।

धारा 120B (अब 61(2) BNS) और चेक बाउंस (धारा 138 NI Act)

मृत्यु, आजीवन कारावास या दो वर्ष या अधिक के कठोर कारावास वाले अपराध के षड्यंत्र में प्रथम अनुसूची कहती है: “इसके अनुसार कि वह अपराध, जो षड्यंत्र द्वारा उद्दिष्ट है, जमानतीय है या अजमानतीय”; यानी 302 के साथ 120B हो तो नियम हत्या वाला है। कोई अन्य आपराधिक षड्यंत्र असंज्ञेय और जमानतीय है।

परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 में सजा दो वर्ष तक का कारावास, या चेक की रकम के दोगुने तक जुर्माना, या दोनों है। अधिनियम स्वयं जमानत के बारे में कुछ नहीं कहता, इसलिए प्रथम अनुसूची का भाग II लागू है: तीन वर्ष से कम सजा वाला अपराध असंज्ञेय और जमानतीय है। संज्ञान केवल चेक पाने वाले या धारक की लिखित शिकायत पर होता है, और विचारण महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट करता है (धारा 142, 143)। समन पर आए अभियुक्त से न्यायालय उपस्थिति के लिए बंधपत्र या जमानतपत्र ले सकता है (धारा 91 BNSS); जमानत की रकम कानून में तय नहीं, पर “अत्यधिक नहीं होगी” (धारा 484(1))। यह अपराध शमनीय (compoundable) है (धारा 147)। फर्म का लेख: Cheque Bounce Case।

जमानतदार (प्रतिभू) कौन बन सकता है, और एक आदमी कितनी बार जमानत दे सकता है?

कानून में जमानतदार को “प्रतिभू” (surety) कहते हैं। BNSS में यह सूची नहीं है कि कौन प्रतिभू बन सकता है; शर्त यह है कि प्रतिभू पर्याप्त और उपयुक्त हो। यह तय करने के लिए न्यायालय शपथपत्रों को सबूत के रूप में स्वीकार कर सकता है, या स्वयं जांच कर सकता है या अपने अधीनस्थ मजिस्ट्रेट से करवा सकता है (धारा 485(4))। कौन से कागज़ लगेंगे, यह BNSS में नहीं लिखा; वह संबंधित न्यायालय बताता है।

एक व्यक्ति कितनी बार प्रतिभू बन सकता है, इसकी कोई संख्या BNSS में तय नहीं है। धारा 486 के अनुसार हर प्रतिभू “न्यायालय के समक्ष ऐसे व्यक्तियों की संख्या के बारे में घोषणा करेगा, जिनके लिए उसने प्रतिभूति दी है जिसके अन्तर्गत अभियुक्त भी है”। प्रतिभू बनना जिम्मेदारी है: अभियुक्त हाजिर न हो और बंधपत्र जब्त हो, तो प्रतिभू से शास्ति (penalty) वसूली जा सकती है, और वसूली न हो सके तो छह महीने तक सिविल कारावास का आदेश हो सकता है; न्यायालय कारण लिखकर शास्ति का कुछ भाग माफ कर सकता है (धारा 491)। प्रतिभू किसी भी समय मजिस्ट्रेट से अपना बंधपत्र उन्मोचित करने का आवेदन कर सकता है (धारा 489)। प्रतिभू अपर्याप्त निकलें तो न्यायालय नए प्रतिभू देने का आदेश दे सकता है (धारा 488)।

जमानत की रकम, और गरीब कैदी रकम न भर पाए तो

रकम कानून में तय नहीं है; वह अत्यधिक नहीं होगी, और “उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय यह निदेश दे सकेगा कि पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट द्वारा अपेक्षित जमानत घटाई जाए” (धारा 484)। सुप्रीम कोर्ट के 8 अक्टूबर 2025 के आदेश के बाद गृह मंत्रालय ने 2 दिसंबर 2025 को “Support to Poor Prisoners” योजना की संशोधित SOP जारी की। इसके अनुसार यदि विचाराधीन कैदी “is not released from the jail within a period of 7 days of order of grant of bail”, तो जेल ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के सचिव को सूचना देती है; ज़िले की अधिकार प्राप्त समिति प्रति मामला 50,000 रुपए तक (विवेक से 1 लाख रुपए तक) की सहायता दे सकती है; और मना करने पर विधिक सहायता अधिवक्ता प्रतिभूति की रकम घटाने का आवेदन कर सकता है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, धन-शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), NDPS या UAPA के, या बाद में निर्दिष्ट किसी अन्य अधिनियम के, अभियुक्तों को यह लाभ नहीं मिलता; आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, दहेज मृत्यु, बलात्संग, मानव तस्करी या POCSO जैसे जघन्य अपराधों के अभियुक्तों को भी यह लाभ देने से मना किया जा सकता है।

जमानत मिलने के बाद क्या होता है?

मुकदमा या जांच चलती रहती है। व्यक्ति को बंधपत्र में लिखे समय और स्थान पर हाजिर होते रहना होता है (धारा 485(1)) और आदेश की हर शर्त माननी होती है। हाजिर न होने पर न्यायालय गिरफ्तारी का वारंट जारी कर सकता है (धारा 92 BNSS)। बिना पर्याप्त कारण हाजिर न होना अपने आप में अपराध है, जिसकी सजा एक वर्ष तक का कारावास, या जुर्माना, या दोनों है, और यह मूल अपराध की सजा के अतिरिक्त है (धारा 269 BNS, पहले 229A IPC)। विचारण पूरा होने से पहले न्यायालय एक बंधपत्र लेता है कि फैसले के विरुद्ध अपील होने पर अभियुक्त ऊपरी न्यायालय के नोटिस पर हाजिर होगा; यह छह महीने तक लागू रहता है (धारा 481)।

जमानत रद्द कैसे होती है?

धारा 480(1) या (2) के अधीन जमानत देने वाला न्यायालय “ऐसा करना आवश्यक समझता है तो, ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने का निदेश दे सकेगा और उसे अभिरक्षा के लिए सुपुर्द कर सकेगा” (धारा 480(5))। उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय यही निदेश इस अध्याय के अधीन जमानत पर छूटे किसी भी व्यक्ति के लिए दे सकता है (धारा 483(3))। शर्त टूटने पर बंधपत्र जब्त हो, तो अभियुक्त और प्रतिभुओं के बंधपत्र रद्द हो जाते हैं, और पर्याप्त कारण न हो तो उसे उस मामले में केवल अपने बंधपत्र पर दोबारा नहीं छोड़ा जाएगा (धारा 492)।

सजा होने के बाद जमानत कैसे मिलती है? (धारा 430 BNSS)

धारा 430, “अपील लंबित रहने तक दंडादेश का निलम्बन, अपीलार्थी का जमानत पर छोड़ा जाना” (पहले CrPC की धारा 389), के अनुसार अपील न्यायालय लिखित कारणों से सजा का निष्पादन निलंबित करके दोषसिद्ध व्यक्ति को जमानत पर छोड़ सकता है; मृत्यु, आजीवन कारावास या कम से कम दस वर्ष वाले अपराध में पहले लोक अभियोजक को लिखित आपत्ति का अवसर मिलेगा, और जमानत रद्द कराने के लिए लोक अभियोजक आवेदन कर सकता है। जो व्यक्ति जमानत पर था और जिसे तीन वर्ष तक की सजा हुई, या जिसका अपराध जमानतीय है और वह जमानत पर था, उसे सजा देने वाला न्यायालय ही, अपील का इरादा बताने पर, अपील दायर करने और अपील न्यायालय का आदेश लेने के समय तक जमानत पर छोड़ेगा, जब तक मना करने के विशेष कारण न हों (धारा 430(3))।

मुफ्त कानूनी सहायता

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के अनुसार अभिरक्षा में मौजूद व्यक्ति, महिला, बच्चा और तय सीमा से कम आय वाला व्यक्ति, अन्य श्रेणियों के साथ, मुफ्त कानूनी सेवाओं का हकदार है, यदि प्राधिकरण संतुष्ट हो कि उसका प्रथमदृष्टया मामला है (धारा 13)। दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (DSLSA) के “Legal Aid” पेज के अनुसार यह सेवा DSLSA, उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति और दिल्ली के ज़िला न्यायालयों में स्थित ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरणों से ली जा सकती है। विचारण या अपील में साधनहीन अभियुक्त के लिए न्यायालय राज्य के खर्च पर अधिवक्ता नियुक्त करेगा (धारा 341(1) BNSS)।

Bail in India – summary in English

Bail is the release of an accused or suspected person from the custody of law on conditions, on executing a bond (without surety) or a bail bond (with surety) (Section 2(1)(b), (d) and (e) of the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS)). Whether an offence is bailable is shown in the First Schedule; under its Part II, an offence under another law punishable with less than three years is bailable unless that law provides otherwise.

In a bailable offence, a person prepared to give bail “shall be released on bail”, and an indigent person who cannot furnish surety is released on his own bond (Section 478, formerly 436 CrPC). In a non-bailable offence, the police officer or Magistrate may grant bail (Section 480, formerly 437), but not where there appear reasonable grounds for believing the person guilty of an offence punishable with death or life imprisonment, unless the court releases a child, a woman, or a sick or infirm person. The Sessions Court and High Court may release “any person accused of an offence and in custody” (Section 483, formerly 439), after notice to the Public Prosecutor in serious cases. Anticipatory bail is under Section 482 (formerly 438).

After the order, the accused executes a bond with sufficient sureties where required; the amount “shall not be excessive” (Section 484), each surety declares how many persons he stands surety for (Section 486), and the court sends a release order to the jail (Section 487). No number of days is fixed for deciding a bail application, but the Supreme Court in Satender Kumar Antil v. CBI (11 July 2022) directed disposal “within a period of two weeks except if the provisions mandate otherwise”; default bail follows after 60 or 90 days if the investigation is not complete (Section 187(3)).

Murder (Section 103(1) BNS, formerly 302 IPC) is non-bailable and triable by the Court of Session, so bail is usually sought from the Sessions Court or High Court; Section 34 IPC is now Section 3(5) BNS. Theft (303(2), formerly 379) is non-bailable but triable by any Magistrate; causing death by negligence (106(1), formerly 304A) and cheque bounce under Section 138 of the Negotiable Instruments Act are bailable. Bail can be cancelled (Sections 480(5), 483(3), 492), bail pending appeal is under Section 430, and a person in custody is entitled to free legal services if the Legal Services Authority is satisfied that he has a prima facie case to defend (Sections 12 and 13, Legal Services Authorities Act, 1987).

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (Frequently asked questions)

जमानत कैसे मिलती है?

पहले देखें कि अपराध जमानतीय है या अजमानतीय; यह BNSS की प्रथम अनुसूची में लिखा है। जमानतीय अपराध में जमानत देने को तैयार व्यक्ति को थाने या न्यायालय से छोड़ा ही जाएगा (धारा 478)। अजमानतीय अपराध में मजिस्ट्रेट के सामने धारा 480 के अधीन, या सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय में धारा 483 के अधीन अर्जी दी जाती है। आदेश के बाद बंधपत्र और प्रतिभू दिए जाते हैं (धारा 485) और न्यायालय जेल को रिहाई आदेश भेजता है (धारा 487)।

गैर जमानती (अजमानतीय) धारा कौन सी है, कैसे पता करें?

धारा 2(1)(ग) BNSS के अनुसार जमानतीय अपराध वह है जो प्रथम अनुसूची में जमानतीय दिखाया गया है या किसी अन्य कानून ने जमानतीय बनाया है; बाकी सब अजमानतीय हैं। अनुसूची में हर धारा के आगे यह लिखा है। दूसरे कानूनों में, जब तक वह कानून कुछ और न कहे, तीन वर्ष से कम कारावास वाले अपराध जमानतीय और तीन वर्ष या अधिक वाले अजमानतीय हैं (भाग II)।

जेल से जमानत कैसे मिलती है?

जेल में बंद व्यक्ति के लिए अर्जी मजिस्ट्रेट के सामने धारा 480 BNSS के अधीन, या सेशन न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय में धारा 483 के अधीन दी जाती है। अधिवक्ता न हो तो विधिक सेवा प्राधिकरण से मुफ्त सहायता मिल सकती है। जमानत और बंधपत्र के बाद न्यायालय जेल के भारसाधक अधिकारी को रिहाई आदेश भेजता है, और वह आदेश मिलने पर व्यक्ति को छोड़ देता है (धारा 487)।

धारा 302 में जमानत कैसे मिलती है?

धारा 302 IPC अब धारा 103(1) BNS है: संज्ञेय, अजमानतीय और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय। धारा 480(1)(i) BNSS के कारण पुलिस या मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को नहीं छोड़ते यदि उसके मृत्यु या आजीवन कारावास वाले अपराध का दोषी होने के उचित आधार हों; केवल न्यायालय शिशु, महिला, रोगी या शिथिलांग व्यक्ति को छोड़ सकता है। इसलिए अर्जी सामान्यतः सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय में धारा 483 के अधीन दी जाती है, और लोक अभियोजक को सूचना दी जाती है।

धारा 302/34 में जमानत कैसे मिलती है?

धारा 34 IPC अब BNS की धारा 3(5) है। यह अलग अपराध नहीं है; सामान्य आशय से किए गए आपराधिक कार्य के लिए हर व्यक्ति उसी प्रकार दायी है मानो उसने अकेले वह कार्य किया हो। इसलिए 302/34 (अब 103(1) के साथ 3(5)) में जमानत का नियम हत्या वाला ही है: अर्जी सामान्यतः सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय में धारा 483 BNSS के अधीन। हर अभियुक्त की भूमिका न्यायालय अलग से देखता है।

302 में जमानत कितने दिन में होती है?

कानून में कोई तय दिन नहीं हैं; यह न्यायालय और तथ्यों पर निर्भर है। सुप्रीम कोर्ट ने Satender Kumar Antil v. CBI (11 जुलाई 2022) में कहा कि जमानत अर्जियां दो सप्ताह में निपटाई जानी चाहिए, जब तक कानून कुछ और न कहे। हत्या मृत्यु से दंडनीय है, इसलिए 90 दिन में जांच पूरी न हो और अभियुक्त आरोप-पत्र से पहले आवेदन करे तो वह जमानत का हकदार है (धारा 187(3) BNSS)। धारा 479 हत्या पर लागू नहीं होती।

चोरी के केस (धारा 379, 411) में जमानत कैसे मिलती है?

चोरी (धारा 303(2) BNS, पहले 379 IPC) और चुराई हुई संपत्ति बेईमानी से प्राप्त करना (317(2), पहले 411) संज्ञेय, अजमानतीय और कोई मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय हैं। सजा मृत्यु या आजीवन कारावास नहीं है, इसलिए मजिस्ट्रेट धारा 480 BNSS के अधीन शर्तों के साथ जमानत दे सकता है; धारा 483 का रास्ता भी है। अभियुक्त पूरे समय अभिरक्षा में हो और साक्ष्य की पहली तारीख से 60 दिन में विचारण पूरा न हो, तो धारा 480(6) लागू होती है।

धारा 353 में जमानत कैसे होती है?

धारा 353 IPC अब धारा 132 BNS है (लोक सेवक को कर्तव्य से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल; दो वर्ष तक, या जुर्माना, या दोनों)। प्रथम अनुसूची इसे संज्ञेय और अजमानतीय बताती है, और कोई मजिस्ट्रेट इसका विचारण करता है। जमानत धारा 480 BNSS के अधीन मजिस्ट्रेट से, या धारा 483 के अधीन सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय से मांगी जाती है; धारा 480(3) की शर्तें लगेंगी।

धारा 306 में जमानत कैसे और कितने दिन में होती है?

धारा 306 IPC अब धारा 108 BNS (आत्महत्या का दुष्प्रेरण) है: दस वर्ष तक का कारावास और जुर्माना; संज्ञेय, अजमानतीय और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय। जमानत धारा 480 या 483 BNSS के अधीन मांगी जाती है, और लोक अभियोजक को सुनवाई का अवसर या सूचना दी जाती है। फैसले के लिए कानून में तय दिन नहीं हैं; सुप्रीम कोर्ट के 2022 के निर्देश के अनुसार जमानत अर्जी दो सप्ताह में निपटाई जानी चाहिए।

धारा 354 या 354B में जमानत कैसे मिलती है?

धारा 354 IPC अब धारा 74 BNS है: अजमानतीय, कोई मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय, सजा एक से पांच वर्ष और जुर्माना। धारा 354B अब धारा 76 BNS है: अजमानतीय, सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय, सजा तीन से सात वर्ष और जुर्माना। धारा 354A (अब 75) भी अनुसूची में अजमानतीय और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है। जमानत धारा 480 या 483 BNSS के अधीन विवेक से मिलती है। 1 जुलाई 2024 से पहले से लंबित मामलों में पुरानी CrPC की अनुसूची लागू होती है (धारा 531 BNSS), जिसमें धारा 354A IPC जमानतीय थी।

दहेज केस या 498A में जमानत कैसे मिलती है?

धारा 498A IPC अब धारा 85 BNS है: अजमानतीय, प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय, और संज्ञेय तभी जब सूचना पीड़ित महिला, उसका नातेदार या (नातेदार न हो तो) अधिसूचित लोक सेवक दे। गिरफ्तारी से पहले सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत (धारा 482 BNSS), और बाद में धारा 480 या 483 के अधीन जमानत मांगी जाती है। दहेज मृत्यु (धारा 80, पहले 304B) अजमानतीय और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है।

चेक बाउंस केस में जमानत कैसे मिलती है, जमानत राशि कितनी है?

परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 में सजा दो वर्ष तक, या चेक की रकम के दोगुने तक जुर्माना, या दोनों है। BNSS की प्रथम अनुसूची के भाग II के अनुसार तीन वर्ष से कम सजा वाला अपराध जमानतीय है, इसलिए इसमें जमानत अधिकार है (धारा 478)। मामला लिखित शिकायत पर चलता है। जमानत की कोई तय राशि कानून में नहीं है; बंधपत्र की रकम अत्यधिक नहीं होगी (धारा 484)।

जमानतदार कौन बन सकता है?

BNSS में प्रतिभू (जमानतदार) बनने वालों की कोई सूची नहीं है; शर्त यह है कि प्रतिभू पर्याप्त और उपयुक्त हो। इसके लिए न्यायालय शपथपत्र स्वीकार कर सकता है या जांच कर या करवा सकता है (धारा 485(4))। प्रतिभू को घोषणा करनी होती है कि वह अभियुक्त सहित कितने लोगों का प्रतिभू है (धारा 486)। अभियुक्त हाजिर न हो तो प्रतिभू से शास्ति वसूली जा सकती है (धारा 491)।

एक आदमी कितनी बार जमानत दे सकता है?

BNSS में कोई संख्या तय नहीं है कि एक व्यक्ति कितने लोगों का प्रतिभू बन सकता है। धारा 486 के अनुसार हर प्रतिभू को न्यायालय के सामने घोषणा करनी होती है कि उसने अभियुक्त सहित कितने व्यक्तियों के लिए प्रतिभूति दी है, सभी सुसंगत विवरणों के साथ। न्यायालय इस घोषणा को, और धारा 485(4) के अधीन शपथपत्र या जांच को, देखकर तय कर सकता है कि प्रतिभू पर्याप्त और उपयुक्त है या नहीं।

अग्रिम जमानत क्या है?

अग्रिम जमानत (anticipatory bail) गिरफ्तारी से पहले सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय से लिया गया यह निदेश है कि अजमानतीय अपराध के अभियोग में गिरफ्तारी होने पर व्यक्ति को जमानत पर छोड़ दिया जाए (धारा 482 BNSS, पहले 438 CrPC)। गिरफ्तारी के बाद यह अर्जी नहीं चलती, और BNS की धारा 65 और 70(2) के अभियोग में यह धारा लागू नहीं होती। विस्तार: फर्म की अग्रिम जमानत मार्गदर्शिका।

सजा होने के बाद जमानत कैसे मिलती है?

अपील न्यायालय लिखित कारणों से सजा का निष्पादन निलंबित करके जमानत दे सकता है (धारा 430(1) BNSS, पहले 389 CrPC); गंभीर अपराधों में पहले लोक अभियोजक को लिखित आपत्ति का अवसर मिलता है। जो जमानत पर था और जिसे तीन वर्ष तक की सजा हुई, या जिसका अपराध जमानतीय है, उसे सजा देने वाला न्यायालय अपील के लिए जमानत पर छोड़ेगा, जब तक विशेष कारण न हों (धारा 430(3))।

जमानत के बाद क्या होता है?

मुकदमा चलता रहता है। व्यक्ति को बंधपत्र में लिखे समय और स्थान पर तब तक हाजिर होते रहना होता है जब तक न्यायालय अन्यथा न कहे (धारा 485(1) BNSS), और हर शर्त माननी होती है। हाजिर न होने पर गिरफ्तारी का वारंट जारी हो सकता है (धारा 92) और बंधपत्र जब्त हो सकता है (धारा 491); बिना पर्याप्त कारण हाजिर न होना धारा 269 BNS (पहले 229A IPC) के अधीन अलग अपराध भी है।

जमानत रद्द कैसे होती है?

जमानत देने वाला न्यायालय आवश्यक समझे तो व्यक्ति को गिरफ्तार कर अभिरक्षा में भेजने का निदेश दे सकता है (धारा 480(5) BNSS); सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय यह निदेश जमानत पर छूटे किसी भी व्यक्ति के लिए दे सकते हैं (धारा 483(3))। शर्त टूटने पर बंधपत्र जब्त होने से अभियुक्त और प्रतिभुओं के बंधपत्र रद्द हो जाते हैं (धारा 492)।

गरीब कैदी जमानत की रकम न भर पाए तो क्या होता है?

जमानतीय अपराध में निर्धन व्यक्ति को बिना प्रतिभू के बंधपत्र पर छोड़ा जाना चाहिए (धारा 478 BNSS)। रकम अत्यधिक हो तो सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय उसे घटा सकते हैं (धारा 484)। गृह मंत्रालय की 2 दिसंबर 2025 की “Support to Poor Prisoners” SOP के अनुसार जमानत के 7 दिन बाद भी रिहाई न हो तो जेल DLSA को सूचना देती है, और 50,000 रुपए तक (विवेक से 1 लाख तक) की सहायता मिल सकती है; कुछ अपराधों के अभियुक्त इससे बाहर हैं।

निष्कर्ष

जमानत कैसे मिलेगी, यह अपराध पर निर्भर है। जमानतीय अपराध में जमानत अधिकार है (धारा 478)। अजमानतीय अपराध में मजिस्ट्रेट धारा 480 के अधीन, और सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय धारा 483 के अधीन, तथ्यों को देखकर जमानत देते हैं; हत्या जैसे मृत्यु या आजीवन कारावास वाले अपराधों में मजिस्ट्रेट पर रोक है, इसलिए वहां सामान्यतः सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय जाना होता है। गिरफ्तारी की आशंका हो तो अग्रिम जमानत धारा 482 में है।

जमानत के फैसले के दिन कानून में तय नहीं हैं, पर 24 घंटे में पेशी, 60 या 90 दिन में जांच पूरी न होने पर जमानत और विचाराधीन कैदियों की अधिकतम अवधि तय हैं। जमानत के बाद तारीखों पर हाजिर रहना और शर्तें मानना जरूरी है, और जो अधिवक्ता का खर्च नहीं उठा सकता, वह विधिक सेवा प्राधिकरण से मुफ्त सहायता ले सकता है।

Sources used for this post: the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (Act No. 46 of 2023), Sections 2(1)(b), (c), (d), (e) and (g), 4, 5, 47, 48, 58, 91, 92, 187, 341, 430, 478 to 492 and 531 and the First Schedule (Parts I and II), English text on India Code (A2023-46.pdf, as on 6 October 2025, checked on 23 October 2026), and its official Hindi text in the Gazette of India (India Code, 202346.pdf, Gazette pages 156, 177, 181, 236, 340, 357 to 363, 378, 380, 381, 383, 387, 404, 406 and 413); the Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 (Act No. 45 of 2023), Sections 2(3), 3(5), 61, 64, 65, 70, 74, 75, 76, 80, 85, 103, 105, 106, 108, 109, 132, 269, 303, 317 and 358, English text on India Code (a2023-45.pdf, as on 6 October 2025) and its official Hindi text (India Code, Hh202345.pdf, Gazette page 17); the firm’s Gazette-checked IPC to BNS and CrPC to BNSS mapping; the Code of Criminal Procedure, 1973, First Schedule (entries for Sections 354A and 354B IPC; India Code consolidated text); the Negotiable Instruments Act, 1881, Sections 138, 142, 143 and 147 (India Code, a1881-26.pdf); the Legal Services Authorities Act, 1987, Sections 12 and 13 (India Code, a1987-39.pdf); the Constitution of India, Article 22 (India Code); the Supreme Court’s own copies of Satender Kumar Antil v. Central Bureau of Investigation (judgment of 11 July 2022, https://api.sci.gov.in/supremecourt/2021/27955/27955_2021_5_1505_36261_Judgement_11-Jul-2022.pdf, and order of 8 October 2025, https://api.sci.gov.in/supremecourt/2022/37889/37889_2022_6_5_64867_Order_08-Oct-2025.pdf), Sushila Aggarwal v. State (NCT of Delhi) (Constitution Bench, 29 January 2020, https://api.sci.gov.in/supremecourt/2017/28027/28027_2017_3_1501_20088_Judgement_29-Jan-2020.pdf, including Justice S. Ravindra Bhat’s summary of Gurbaksh Singh Sibbia v. State of Punjab, 1980), M. Ravindran v. Intelligence Officer, Directorate of Revenue Intelligence (26 October 2020, https://api.sci.gov.in/supremecourt/2020/8936/8936_2020_39_1501_24488_Judgement_26-Oct-2020.pdf), Enforcement Directorate v. Kapil Wadhawan (27 March 2023, https://api.sci.gov.in/supremecourt/2020/17613/17613_2020_16_1501_43163_Order_27-Mar-2023.pdf), Social Action Forum for Manav Adhikar v. Union of India (14 September 2018, https://api.sci.gov.in/supremecourt/2014/40984/40984_2014_Judgement_14-Sep-2018.pdf), Mohammed Rasal C. v. State of Kerala (orders of 8 September 2025, https://api.sci.gov.in/supremecourt/2025/16762/16762_2025_3_2_63970_Order_08-Sep-2025.pdf, and 12 November 2025, https://www.sci.gov.in/sci-get-pdf/?diary_no=167622025&type=o&order_date=2025-11-12&from=latest_judgements_order) and In Re: Inhuman Conditions in 1382 Prisons (order of 23 August 2024, W.P.(C) No. 406 of 2013, https://api.sci.gov.in/supremecourt/2013/18545/18545_2013_9_2_55018_Order_23-Aug-2024.pdf); the Ministry of Home Affairs letter No. V-17013/26/2023-PR of 2 December 2025 (“Revised Guidelines and SOP for implementation of “Support to Poor Prisoners” Scheme”, MHA website, file SOP_04122025.pdf); and the Delhi State Legal Services Authority’s “Legal Aid” page (https://delhi.nalsa.gov.in/?p=6549, read 23 October 2026).

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